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एक बरस और बीत गया…


पीछले साल जब मैंने अपना नव वर्ष का बधाई सन्देश लिखा था तो मैंने कहा था की वर्ष २०१४ असीमित संभावनाओ का वर्ष है. वाकई कई मायनों में, वर्ष २०१४ असीमित संभावनाओ का वर्ष निकला भी. किसने सोचा था की देश का जनमानस एकजुट होकर देश के सबसे बड़े पर्व यानी आम चुनाव में इस तरह से बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेगा. और विस्मयकारी परिणाम लाकर सबको चौंका देगा.

आज ३१ दिसम्बर २०१४ जब मैं को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है की वाकई हमारे देश के प्रजातंत्र ने प्रगति की है. हम देश के नागरिक प्रजातंत्र की ताकत को पहचानने लगे है. अच्छे और बुरे का फर्क पहचानने लगे है. अब सिर्फ शराब और चंद रुपयों का लालच हमें अपने निर्णय लेने से नहीं रोक पाता है. ऐसा नहीं है की अब सब कुछ साफ़ सुथरा हो गया है, लेकिन कुछ बदलाव जरुर हुआ है. पता नहीं आपको लगा या नहीं, लेकिन मैंने महसूस किया है.

मेरा चुनावी अनुभव
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जब चुनावों में मैंने कई राज्यों में प्रवास किया, तो मैंने हर किसी के मन में एक तड़प देखी थी. वो तड़प थी, पीछे छूट जाने की. वो तड़प थी, सियासतगारों द्वारा ठगे जाने की. वो तड़प थी, दो जून की रोटी के लिए मशक्कत करने की. वो तड़प थी, अपना आत्मसम्मान खो जाने और दाने दाने को मोहताज हो जाने की. वो तड़प थी, विश्व पटल पर भारत का नाम भ्रष्ट देशो में अग्रणी रहने की. वो तड़प थी, रोज-रोज बलात्कार और तार-तार होती इज्जत की. भारत के नागरिक ने अपने मत का प्रयोग कर उस तड़प को आवाज देने की कोशिश की है.

लगभग सात माह से देश में पूर्ण बहुमत की सरकार काबीज है. कुछ हद तक देश का माहोल बदला है. लोगों की उम्मीद को आसरा मिला है. लोगों ने जिन आकांक्षाओं से ये नयी सरकार बनाई है, मैं उम्मीद करता हूँ की आने वाले समय मैं उनकी उम्मीदों को किनारा मिलेगा.

लगता है विषयांतर हो गया. आज का मेरा विषय राजनीति नहीं बल्कि आपनीति या आपबीती है. आज के दिन मैं हर वर्ष की भांति, अपने बीते हुए कैलेंडर वर्ष का लेखा जोखा करता हूँ. पिछले वर्ष निर्धारित किये हुए लक्ष्यो का क्या हुआ? कितने लक्ष्य सिद्ध हुए, कितने बाकी रह गए और कितने उनछुये रह गए?

कई मायनों में मेरे लिए यह वर्ष अत्यंत की सतोषप्रद रहा है. देश में हुए सबसे बड़े परिवर्तन में छोटी सी ही सही पर सक्रीय भूमिका निभाना एक आत्मसंतोष प्रदान करता है. खासकर तब जब, सारा देश आपके किये हुए कार्य का गवाह बना हो. कुछ और भी बाते थी जो मेरे लिए संतोषप्रद रही.

सोशल मीडिया कैंपेन एवं प्रवास
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इसी वर्ष, मेरे कई अर्सों से चली आ रही ख्वाहिश भी पूरी होने जा रही थी. मेरा आईआईएम अहमदाबाद में दाखिला जो हो गया था. जिस दिन चुनाव शुरू हुए उसी दिन मेरा एक वर्ष का पीजीपीएक्स का कोर्से शुरू हुआ. यद्यपि मैं चुनाव के दिनों में और सहयोग नहीं दे पाया लेकिन पिछले एक साल में काफी कुछ स्थापित कर चूका था. वर्ष 2013 अक्टूबर में पार्टी ने मुझे युवा मोर्चा के लिए सोशल मीडिया कैंपेन चलाने की जिम्मेदारी दी थी. हमने सर्वप्रथम सदस्यता अभियान चला कर सदस्य जोड़े| फिर उन सदस्यों को ऑनलाइन काम सौपने की योजना बनायी गयी. इसके लिए सर्वप्रथम हमें कंटेंट क्रिएशन टीम यानी रिसर्च एंड एनालिटिक्स टीम बनाने की जरुरत थी. पार्टी के अन्य सहयोगियों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर हमने एक महीने के भीतर पार्टी मुख्यालय पर एक कण्ट्रोल रूम (वार रूम) एवं कंटेंट क्रिएशन टीम की स्थापना की.

 

इस टीम के काम शुरू करने के बाद, जरुरी था राज्यों की युवा मोर्चा टीम से समन्यवय बनाना और पार्टी के रास्ट्रीय मुख्यालय पर बने कण्ट्रोल रूम की तर्ज पर राज्य में भी ऐसी ही टीम तैयार करना. अहमदाबाद आने से पूर्व मुझे दस से ज्यादा राज्यों में ऐसे सेंटर्स बनाने, और टीम तैयार करने का सौभाग्य मिला. सबसे पहले मैं हिमाचल प्रदेश होते हुए चंडीगढ़ गया, फिर उत्तराखंड, एवं राजस्थान. अपने दुसरे दौर मैं ओडिशा, प. बंगाल, झारखण्ड, एवं बिहार गया. इस दौरान कई युवाओ से मुलाकात हुयी, कई नए मित्र बने. पार्टी में चल रही गतिविधियों की जानकारी प्राप्त हुई. सबसे बड़ा सकून यह देख के लगा की सारा देश बदलाव की तयारी में लगा है. कोई कौना ऐसा नहीं दिखा जिसे आने वाले परिवर्तन का आभास ना हो. ये यात्राएं मुझे जीवन का नया अनुभव और सुकून देकर गयी. मेरे तीसरे दौर का कार्यक्रम दक्षिण भारत में प्रवास करना था. जिसके तहत मैं केरल, कर्णाटक, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश एवं महाराष्ट्र जाने वाला था. हालांकि किंचित कारणों से मुझे यह प्रवास निरस्त करना पड़ा. भारतवर्ष के एक बड़े हिस्से और को देखने और समझने का मौका जरुर मिलता. मुझे यकीन है की जल्द ही ऐसा मौका फिर आएगा.

आईआईएम अहमदाबाद का सफ़र
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अब बात करता हूँ, अपने आईआईएम अहमदाबाद के अब तक के सफ़र का. ७ अप्रैल २०१४ से शुरू हुआ था यह सफ़र. २०१४ के आम चुनाव का पहले दिन का मतदान इसी दिन हुआ. इससे बड़ा संयोंग ये था की इसी दिन एक बाप और एक बेटी स्कूल जा रहे थे. जी हाँ, इसी दिन गीतांजलि ने भी अपनी नर्सरी की कक्षाएं शुरू की. संभवत: मेरा फॉर्मल एजुकेशन का ये आखिरी सौपन था और उसका निश्चय ही प्रथम. संयोग देखिये, की इसी दिन ही मेरा नया पासपोर्ट भी जारी हुआ.

आईआईएम ए का अब तक का सफ़र अत्यंत ही शानदार रहा है. मेरे मन में भारत के सबसे बेहतरीन संस्थान से शिक्षा प्राप्त करने का जो कीड़ा कई वर्षो कुलबुला रहा था, यहाँ आकर उसकी क्षुधा अब जाकर शांत हुई.

यद्यपि आज हम अपने आखिरी टर्म में है, मात्र ७५ दिन और बचे हैं यहाँ से रुखसत होने में. ऐसा लगता है की यहाँ अभी कल ही आये हैं. समय का पहिया किस गति से चला इसका आभास भी नहीं हो पाया. अब यहाँ से चले जाने की भावनाएं दिल में घर करने लगी है. संस्थान की दीवारे और क्लास रूम्स मानो हमसे कह रहे हों, कि कुछ देर तो और रुकते. अभी तो ठीक से तुम्हे देखा भी नहीं.

यहाँ के प्रोफ़ेसर्स में, यहाँ के वातावरण में कुछ तो बात है जो इसको अद्वितीय बनाते हैं. एक से एक प्रोफेसर हैं यहाँ – अनुभवी और प्रतिभाओं के धनी. एक साल में ३०० से ज्यादा केस स्टडीज पढाना और पढना कोई खाने का काम नहीं है. यह काबिलियत यहाँ आने वाले हर छात्र के अन्दर पहले से मौजूद होती है जो शायद यहाँ आकर प्रखर और प्रबल और मुखर हो जाती है. मेहनत करना और अलग सोचना उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है.

पीजीपीक्स – एक वर्षीय MBA कोर्स
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पीजीपीएक्स (Post Graduate Program in Management for Executives) अनुभवी लोगों के लिए आईआईएम अहमदाबाद का एक वर्ष का कोर्से है. इसके टर्म I और II जनरल मैनेजमेंट के आधार स्तंभ तैयार करते हैं. यानी की प्रबंधन के जरुरी संकायों का ज्ञान. फिर टर्म III इंटरनेशनल इमर्शन प्रोग्राम (International Immersion Program) होता हैं. यह दो हफ्ते का प्रोग्राम है जिसके तहत पीजीपीएक्स के छात्र अन्य देशों के मैनेजमेंट कॉलेजो में जाते हैं. और वहां के छात्र यहाँ आते हैं. इस प्रोग्राम से छात्रों को एक नया बिज़नस कल्चर और माहौल देखने को मिलता है. मैं इंग्लैंड के वार्विक बिज़नस स्कूल (Warwick Business School, Coventry, UK) गया. सिर्फ दो हफ्ते में ही हमें वहा के उम्दा प्रोफेसर्स से बहूत कुछ सिखने को मिला. चार बड़ी कंपनियों के वेयरहाउस एवं लोजिस्टिक्स सेंटर्स देखने को मिले. वहां के छात्रों से मिलना, और वहां के बिज़नस को जानने और समझने का अनुभव प्रथम और नया था. पीजीपीएक्स के टर्म IV और V आपको सीखाते हैं लीडरशिप और हायर मैनेजमेंट के गुर. इसमें ज्यादातर विषय आपको चुनने की स्वतंत्रता मिलती है. छात्र अपनी रूचि और करियर को ध्यान में रख कर विषयों का चयन करते हैं.

 

कठिन लक्ष्य और चुनौती भरे निर्णय
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अब बात करते हैं इस वर्ष में मेरे द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों, और जोखिमों की. मेरे लिए यह वर्ष अपार संभावनाओं के साथ अपार चुनौतियों भी लेकर आया. मैं अहमदाबाद आ चूका था, मेरी बेटी ने स्कूल जाना शुरू किया था. मेरी पत्नी मेरी बेटी और अपने भाई के साथ दिल्ली में रह रही थी. लेकिन तभी मेरी पत्नी को उसकी कंपनी टीसीएस ने जरुरी काम से UK भेजने का निर्णय लिया. यह हमारे लिए एक चुनौतीपूर्ण अवसर था. इसको ना करने का मतलब, इस अवसर को खोना और हाँ करने का मतलब, मेरी बेटी को एक वर्ष अपने मामा के भरोसे छोड़ने का कठिन निर्णय. एक तो उसके मामाजी की खुद हाल ही में शादी हुई थी. उन्हें बच्चे अकेले सँभालने का अनुभव नहीं था. हालांकि अंत में मुझे मेरे अपने परिवार और ससुराल से अच्छा सहयोग मिला. आखिर मैंने अपनी पत्नी को UK भेजने का कठिन निर्णय ले ही लिया. मैं २० लाख का लोन लेकर अहमदाबाद में पढ़ रहा हूँ. मेरी बेटी अपने मामाजी और मामीजी के पास दिल्ली में पढ़ रही है और मेरी पत्नी अकेले UK में जॉब कर रही है. निर्णय कठिन था लेकिन दिल को मजबूत करके ले ही लिया. अब मैं अपनी बेटी के पास जाने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा हूँ. मेरी पत्नी को आने में अभी कुछ समय और लगेगा, तब तक मेरे लिए समय चुनौतीपूर्ण ही रहेगा.

आईआईएम अहमदाबाद में में एक ऊँची नौकरी पाने के लक्ष्य के साथ नहीं आया था. हालाँकि अपने सर पर खड़े लोन को चुकाने के लिए कुछ समय नौकरी का सहारा भी लेना होगा. लेकिन असल में मैं अपना खुद का बिज़नस शुरू करना चाहता हूँ. आईआईएम में रहकर मैं अपने इस लक्ष्य पर काम कर रहा हूँ.

सुसुप्त रुचियों को मिला नया आयाम
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समाप्त करने से पहले मैं इस वर्ष की दो-तीन उपलब्धियां और साझा करना चाहता हूँ. आईआईएम में आकर मेरा दृष्टिकोण तो वृहद हुआ ही है, मैंने अपनी कुछ सुसुप्त रूचियों को भी नए आयाम दिए हैं. मेरे सहपाठियों के प्रोत्साहन से मैंने अपनी कविता लेखन की प्रतिभा को फिर से जिन्दा किया है. मैं अब तक २५ से ज्यादा कवितायेँ आईआईएम की घटनाओ, कोर्से, और प्रोफेसर्स पर लिख चूका हूँ. कोर्स के अंत में एक पुस्तक के रूप में उसका प्रस्तुति करने की मनसा है.

अभिव्यक्ति और झिझक का सामना
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मैंने आईआईएम में मिले हर अवसर का भरपूर लाभ उठाया है. मैंने कल्चरल इवेंट्स में पुरे मनोयोग से भाग लिया. क्या गाना, क्या नाट्य, क्या नृत्य, किसी भी अवसर को नहीं गंवाया. सभी में मैंने अपना योगदान देने की और अपनी रूचि को पूरा करने की कोशिश की. कोशिश थी अपने मन से किसी भी तरह की झिझक को निकाल फेंकने की. और स्वयं को किसी भी कार्य और परिस्तिथि के लिए तैयार करने की. इस वर्ष पीजीपीएक्स बैच ने टी-नाईट (टैलेंट इवेंट) जीतकर इतिहास्र भी रचा है. जीतने वाली टीम का हिस्सा बनना भी अत्यंत ही सुखद था. मुझे अवसर देने के लिए मैं अपने सहपाठियों का आभार व्यक्त करता हूँ. अगर वो मेरा मनोबल नहीं बढ़ाते तो मेरे लिए यह सब करना संभव नहीं था.

आईआईएम ए में आकर मुझे मिले मेरे अनमोल साथियों के लिए मैं ईश्वर का आभारी हूँ.

मीडिया कवरेज एवं Motivational Speeches
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अन्य कई समाचार पत्रों के आलावा मुझे इकोनॉमिक्स टाइम्स मैगज़ीन (Economics Times Magazine) के कवर पेज पर आने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ. उन्होंने मेरे प्रोफाइल में रूचि दिखाई और अपनी कवर पेज कहानी “Unusual MBAs” मुझे जगह दी. इसके साथ ही मुझे तीन जगह से स्पीच देने का आमंत्रण भी मिला. प्रथम – अहमदाबाद की शारदा विद्या मंदिर स्कूल में टीचर्स से रूबरू हुआ. बदलते आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक, एवं पारिवारिक परिवेश में किस तरह गुरुओ की भूमिका अहम है, इस विषय पर बात की. फिर NCC के कैडेट्स और अहमदाबाद के अन्य संस्थानों से आये सेंकडो छात्र-छात्राओं से “Nation First – Character Must” विषय पर बात की. राष्ट्र निर्माण युवाओ की अहम् भागीदारी पर भी बात हुई. आगामी 10 जनवारी को विशाखापट्नम की गीतम यूनिवर्सिटी से एक TEDx टॉक में बोलने का आमंत्रण हैं.

आम चुनाव २०१४ पर पुस्तक
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अब अंतिम बात, मैंने अपने पुस्तक लेखन रूचि को भी नए आयाम दिए हैं. आईआईएम ए के प्रोफेसर श्री धीरज शर्मा के साथ मिलकर मैं एक पुस्तक भी लिख रहा हु. जिसका प्रथम ड्राफ्ट बनकर पब्लिशर के पास जाने को तैयार है. सब कुछ सही रहा तो कोर्स ख़त्म होने से पहले यह पुस्तक आपके सामने आ जाएगी. पुस्तक का विषय २०१४ के आम चुनाव है. चूँकि यह चुनाव अभूतपूर्व था, इस चुनाव में इस्तेमाल हुई विविध नेतृत्व तकनीक, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया, चुनाव में बनी कूटनीति एंड उसका सफल क्रियान्वयन कैसे हुआ –पर यह पुष्तक प्रकाश डालती है. आशा हैं चुनाव का मेरा व्यक्तिगत अनुभव और डॉ. शर्मा की मार्केटिंग की दक्ष्यता का मिश्रण एक अच्छी पुष्तक को जन्म देगा. आशा है यह आपके लिए एक बेहतरीन और पढने लायक पुस्तक सिद्ध होगी.

लक्ष्य जो उनछुये रह गए
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कुल मिलकर वर्ष २०१४ मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से असीम संभावनाओं और सफलताओं का वर्ष रहा है. मैंने जितने लक्ष्य तय किये थे, अधिकतर हासिल किये. इसके आलावा भी कुछ नए लक्ष्य बने और हासिल किये गए. कुछ लक्ष्य जिनपर मैं ज्यादा कार्य नहीं कर सका उनपर कोर्से ख़त्म होते ही युद्ध स्तर पर कार्य शुरू करने की प्रबल इच्छा है. मेरे यहाँ आने की वजह से मेरे अपने एक मंच का कार्य प्रगति नहीं कर सका.

नव वर्ष की शुभकामनाएं
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आप सबका नया वर्ष वैभवशाली और गौरवशाली बने ऐसी मैं इश्वर से प्राथना करता हूँ. वर्ष २०१५ में आप नए लक्ष्य बनाये और नयी ऊँचाइयों को प्राप्त करें, ऐसी मेरी परम पिता परमेश्वर से मंगलकामना हैं.

नारायण सिंह राव “सैलाब” || १ जनवरी २०१५

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